
मैं आषाढ का पहला बादल
शनिवार, नवंबर 26, 2011
गुरुवार, सितंबर 08, 2011
कंप्यूटर
खोल देता है
कई खिङकियां
घुसता है दिमाग
आँखों के सहारे कूदकर
उस भूल भुलैया में
भटकता रहता घंटों
उन पहेलियों के बीच
खिंचती रहती है
आंखों से बंधी डोर
भटकता रहता है दिमाग
बेखयाल
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कंप्यूटर की खिङकियों में हैं
कई रंग
कई नजारे और
कई इशारे
कठपुतलियों की तरह
नाचते हैं साफ्टवेयर
उंगलियों के इशारे से
बनती बिगङती है दुनिया
लगता है
शहंशाह हूं मैं
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कंप्यूटर की रोशनी में
टंगी हैं आंखें
खिचती-रहती है
दिमाग की नसें
बंधा रहता है
बेलगाम मन
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बंद होने के बाद भी
बचा रहता है कंप्यूटर
रात को सपने में
दबता है माउस
बदलता है विंडो
कीबोर्ड पर चटकती है
उंगलियां
बिजली जाने पर
रिमोट को करते हैं
कंट्रोल एस
घर बैठे
हैंग हो जाता है दिमाग
बवंडर

प्यार
बवंडर की तरह आया था मुझमें
किसी एक्शन मूवी की तरह
मेरे सूने जीवन में
वैसे तो महसूस ली थी खुशबू
उस चक्रवात की
उमङने-घुमङने से पहले ही
मगर, चेत न पाया
मांगने से पहले मेरे घरौंदे में
भरी थी गुलाब की पंखुङियां
मौका न था
आंगन बुहारने और बिस्तरा लगाने का
पहुंच गयी थी मेहमानों की टोली
हंसते-खिलखिलाते बारातियों का हुजूम
मेर चूल्हा जला नहीं था
लिस्ट भी नहीं बनी थी पकवानों की
मेहमान लौट गये, बिना कुछ बोले
पूछा भी तो, कर दिया बहाना
आसान न था सामना कर पाना
उन जवाबों का, जो थे...
पत्थरों से सख्त और बर्फ से ठंडे
घर बुहारा भी, बिस्तर भी सजाया
बार-बार पुकारा, संदेशा भिजवाया
मगर...
अब तो सिर्फ तूफान है
जो थमने का नाम नहीं लेता
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बरसों बाद जब मिले
तो तुम-तुम न थे
मैं भी मैं न रहा होउंगा
तुम्हें अपने बेटे को स्कूल से लाना था
और मुझे पकङनी थी शाम की ट्रेन
फिर भी मिले
क्योंकि थोड़े से हम तो बचे ही थे
वक्त के साथ रिस-रिस कर जमा हुआ
थोडा-थोडा लगाव
काफी था उस एक घंटे के लिए
शुक्र था वह एक ही घंटा था
कई दिन होते तो कोफ्त होती
जिंदगी ने सही फैसला किया था
हम नहीं बने थे एक दूजे के लिए
हमें मान लेना चाहिये था कि
जी लिया है हमने अपने रिश्ते का आखिरी पल
तुम्हारी आंखों में झांक रहा था मैं
तुमने पूछ ही लिया-
कितनी बदली हूं मैं..
बवंडर- २
मिट्टी के बरतन में
दहकते रेत की तरह
उबल रहा था दिल
तभी जन्मा था प्यार
कितनी कोशिशें की थी
उस दहकते रेत को
मुट्ठी में भर लेने की मैंने
फिसलती रही रेत और
रिसता रहा हथेलियों से खून
अब, जब रात उतर आयी
और चांद का ठंडा पानी
रेत में रिस रहा है
तुम मेरे दिल में हो
बवंडर की तरह
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पूछना चाहता हूं
सिर्फ एक सवाल
कई बार पूछा
बारहां चुप ही रह गया
उसने कई बार दिये थे जवाब
बारहां टाल भी दिया
अब भी वही एक सवाल
एक ही सवाल के क्यों हैं
इतने सारे जवाब...
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लोग लाख कहें
मुझसे न दिया जायेगा कोई इल्जाम
सराहूंगा या चुप रहूंगा
मुझे कुछ कहना नहीं है
सिर्फ पूछना है
और चुप रहना है
कुछ भी साबित नहीं करना है मुझे
मेरा प्रेम तो खुद ही साबित है
जगजाहिर है
मैं चुप रहता हूं
और सुनता हूं
कई जवाबों को, जो एक ही सवाल के हैं
दूसरों के मुंह से छनकर आते हैं तुम्हारे जवाब
जवाबों की लिस्ट लंबी हो रही है
और गहरी हैं मेरी चुप्पियां
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रोज रात
जब मैं लेता हूं बीपी की दवा
याद आता है मुझे वह प्यार
वह असफल प्रेम
जो बरसों घुमङता रहा
तूफान की तरह मेरे सीने में
अब एक रोग है
डिप्रेशन में खाये गये
जंक फूड
धमनियों में जमा हैं
और बहुत धीरे-धीरे थम रही है
दिल की धङकनें
कम नहीं होती खून की रफ्तार
हर रात याद आता है मुझे मेरा प्यार
शनिवार, मार्च 05, 2011
भूलने की आदत
सोमवार, जुलाई 05, 2010
उम्मीद
शनिवार, अगस्त 16, 2008
मेरिट
तुम तो कहते थे कि बरसात में बरसेगी शराब
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया।
सचमुच
जब तुम यह सोच रहे होगे कि
डर गये दुश्मन तुम्हारे नारों से
और उनके पास तर्क नहीं बचे
तुम्हारे सवालों के बरक्श।
हमारा दिल टूटा जा रहा था
और हम उन्हें हथेलियों से थामे
अवाक हो चुकी आंखों से
तक रहे थे तुम्हारे तेवर को।
जब सांसों की डोर भी
गिरवी में रखकर पढ़ाया था तुम्हें
एक दबी सी चाहत जरूर थी कि जब
कि जब ताकत भर आएगी तुम्हारे बाजुओं में
तो लौट ही आओगे सहारा देकर उठाने
अपने धराशायी घरों को।
मगर तुम्हारी साफगोई कि तुमने कह ही दिया
कि बस जाओगे वहीं-कहीं
किसी बड़े शहर की गर्म-गुदाज बाहों में।
तब भी हमने आह को निकलने नहीं दिया
सिर्फ तारीफ ही निकली हमारी जुबां से
कि कैसे-कैसे झंंडे फहरा रहे हैं
हमारे वीर देश-विदेश में
वे रचने में जुटे हैं नया भारत
‘चमकदार भारत’।
पर जब तुमने अपने ही भाई को
घुसने नहीं दिया
उस चमकदार भारत में।
कह दिया,‘मेरिट नहीं है तुम्हारे पास’
तो टूटना ही था हमारे दिल को।
और फिर तर्कों के तीर चले
तुमने भी कह दिया
कोई अहसान नहीं
तुम पर हुए हमारे खर्च
ये तो मेरिट के मुआवजे हैं
मेरिट की कीमत हैं
मेरिट का अधिकार हैं
लिहाजा हमें डर ही जाना था इसे मेरिट के तेवर से
माफ करना अगर तुम्हें बुरा लग जाया यह सुनकर
कि ऐन उसी वक्त हमें याद आ गया
कि जिस मेरिट के तेवर से तुम हमें डरा-धमका रहे हो
वह जुटा है साबुन-तेल और मंजन बेचने में।
वह करोड़ों के लक्जरी अस्पताल में बैठा
लाखों में कर रहा है हमारी जान का सौदा
वह टीवी- मोबाइल और कम्प्यूटर के प्रोग्राम बना रहा है
और उसकी नजर है हमारी छोटी सी बचत पर।
और वह मेरिट
एक ऐसा भारत बनाने में जुटी है
जिसमें अमन पसंद अमीरों के लिये
सहूलियत से उपलब्ध हो
शराब, सेक्स और अफीम
और उनके जश्न में
खलल न पड़े
भूखे-नंगों की चीख से।
हमने टीवी पर देखा
पानी के बौछारों के बीच
खड़े थे तुम किसी फिल्मी नायक की तरह
और मसखरे साबित हो गये थे हमलोग।
(संदर्भ- आरक्षण के समर्थन में एम्स के डाक्टरों का प्रदर्शन )
निरर्थकता
गाड़ी में बैठे-बैठे
तुम सोच रहे हो कि
कैसे निरर्थक साबित हो गये तुम
सफलता और सार्थकता के बीच की दूरी
तय करते-करते।
आदर्श तुम्हारे लिये
रही हमेशा किसी आवेग की तरह
जिसके आने और छा जाने पर
कुछ और ही हो जाते थे तुम
और उसके लौटने पर
तुम भी वही थे, जैसे हजारों और थे इस दुनिया में
महत्वाकांक्षी और अवसरवादी।
तुमने हर बार
अपना लेना चाहा था किसी एक को
दो तरह के सपनों में।
वह तुम ही थे जो सोचते थे कि
कह दें दुख में डूबे हर इंसान को
कि अकेले नहीं हो तुम
तुम्हारा दुख मेरा भी है।
और वह कोई और थोड़े ही था
जो मचल उठता था
किसी की लाखों की कमाई देखकर।
तालियों और तारीफों के बीच
विकसित होने वाले तुम
कितने कमजोर थे
जो उपेक्षा और अपमान की
पहली चोट से ही
भाग खड़े होते थे हर बार।
और इस डर ने
कहीं का भी रहने नहीं दिया तुम्हें।
अब तुम कहते कुछ और हो
और करते कुछ और
और कुछ भी ऐसा नहीं हो पाता
जो तुम्हारा भला कर पाये।
तुम जब भी हंसते हो
अमीरों के जीवन की व्यर्थता पर
तो ईष्र्यालु नजर आते हो
और उनकी राह पर चलते हुए
नातजुर्बेकार।
बुधवार, जुलाई 23, 2008
उदास चेहरे
असफलता की निराशा के बाद
जब बच जाती है ‘फीकी सी हंसी’
ईश्वर हुलस उठता है ऐसे चेहरे देखकर
अपनी कूची से उसे तरह-तरह के रंग देने
इंसान
उसकी सर्वोत्तम कृति
हर पल दुनिया पर छा जाने की कोशिश में जुटा
सोचा हुआ सच करने वाला जिद्दी
और ईश्वर को पसंद हैं, उसके उदास चेहरे
उसकी कोशिशें,
छटपटाहटें, योजनाएं, कदम-कयास
सब-कुछ किसी कोने से देखता रहता है,
मुस्कुराते हुए
और जब हार जाता है
बुझ जाता है और निराश हो जाता है
तभी मिल पाती है, उसके चेहरे को ‘उदासी’
वह फीकी सी मुस्कुराहट
जो ईश्वर के लिये होती है
क्योंकि, जाने-अनजाने उसे मालूम होता है
ईश्वर के पास उसे देने के लिये कुछ तो है
‘ दे क्यों नहीं देता वह?’
शुक्रवार, जुलाई 11, 2008
विजेता अशोक
कट कर पड़ी थी, युद्ध क्षेत्र में
और उनके बीच
अश्वारोही अशोक
सोच रहा था
कि कितना फर्क है,
युद्ध की फसल और खेतों की उपज में
कितनी बेतरतीब गिरी हैं ये लाशें
इन्हें समेट कर खजाना भर लेना भी तो मुमकिन नहीं
अपने विजयोत्सव के मुहाने पर
शोक में डूब गया अ-शोक।
चाहा आसपास मिल जाए कोई कृष्ण।
जिसकी गीता साबित कर दे
कि सही किया,
जो कुछ भी उसने किया
यही था एक मात्र उचित विकल्प
मगर हर क्षण
उसकी निगाहों के सामने
छा जाती थी उस नवयौवना की सूरत
अपनी लाश पर चढ़े बिना
छूने नहीं दिया जिसने
‘कलिंग का भाल’
दुःख और क्षोभ से भरा
अशोक
बेबस हो उठा
लौट पड़ा अपने शिविर की ओर
मगर तभी,
उसके अश्व ने पहला पग उठाया था उसी वक्त
पीछे से आई व्यंग्य भरी आवाज-
‘भाग रहा है भगोड़ा’
‘कौन है?’ वह पलटा
‘तो क्या समाप्त नहीं हुआ युद्ध?’
‘अब भी बचे रह गये हैं विपक्षी सैनिक?’
‘इतने शवों से भी तय नहीं हुई विजय?’
वह पलटा
देखा- युद्ध क्षेत्र भरा-पड़ा है विपक्षी सैनिकों से
और अपनी पाली में खड़ा है वह अकेला
आश्चर्य और भय से भर उठा उसका हृदय
मगर जुटाकर हिम्मत
आवाज में बुलंदी
पूछा बैठा-
‘कौन हो तुम लोग?’
‘क्या अब भी बच गये हैं कलिंग में सैनिक?’
‘नहीं’
विपक्षी दल के सेनापति ने कहा
‘हम नहीं हैं कलिंग के सैनिक’
‘न ही और किसी साम्राज्य के’
‘बस इतना समझ लो कि तुम्हारे विपक्षी हैं
हमें जीते बिना बन नहीं पाओगे विजेता’
‘विजेता क्या?’
‘मगध पर भी नहीं देंगे तुम्हें शासन का अधिकार’
‘पहले युद्ध करो, हमें जीतो, फिर चैन से बैठना
अपने राजसिंहासन पर’
भयातुर अशोक ने फिर डाली
शत्रुदल पर निगाह
नकाब से ढके थे उनके चेहरे
जुटाकर हिम्मत उसने फिर पूछा-
‘पहले परिचय तो दो’
‘कम से कम चेहरे तो दिखा दो’
इस आग्रह पर
ठठाकर हंस पर विपक्षी सेनापति
कहा-‘हार गये तुम अशोक’
‘युद्ध उसकी पराजय होती है तय
पहचान नहीं पाता जो शत्रु को भी’
उत्तर बहुत तीखा था
मगर तिलमिलाया नहीं अशोक
उठी नहीं उसके सीने से
क्रोध की लहर।
फूट पड़े बस यही शब्द-
‘हारेगा नहीं अशोक’
‘लड़ेगा पहचानेगा शत्रुओं को
और जीतेगा इस युद्ध को’
यह कहते ही बंद कर ली उसने आंखें
उलट ली पुतलियां अपने मन की ओर
कुछ देर खड़ा रहा निश्चल
फिर उतरा घोड़े से,
फेक दी तलवार
कवच-ढाल, तीर-कमान
मुकुट और महत्वाकांक्षाएं
और क्रोध
करबद्ध, मुस्काता चेहर
बढ़ चला अशोक
शत्रुदल की ओर
उधर से आई आवाज-
‘विजेता अशोक’
