बुधवार, मार्च 06, 2013

डोकमेंटरी सूटिंग(रेडियो कोसी -11)

अचानक प्रह्लाद को लगा कि कोई उसको झकझोर रहा है... आंखें खोली तो सामने दीपाजी थीं. वह हड़बड़ा कर उठकर बैठा... अभी तो वह उनके साथ ट्रेन पर बैठा ही थी, इतनी जल्दी गांव कैसे पहुंच गया. फिर देखा कि दीपाजी ने सलवार-सूट नहीं, साड़ी पहन रखा है... हाथ में चाय की प्याली है.
- जल्दी, आंख धोओ और चाय पियो, जिस टीवी रिपोर्टर को लेकर आये हो, वह तुम्हारा इंतजार कर रहा है.
- आयं... अरे अभी तो आधा कहानी ही सोचे थे मैडम... अभी तो गुरदासपुर से ट्रेन पर बैठे ही थे.
- क्या मतलब...
- अरे अनीस भाय जो हैं न, रेडियो कोसी पर डोकमेंटरी बनायेंगे... हमसे कहानी पूछेंगे अभी... तो लेटे-लेटे कहानी जोड़ रहे थे... अभी गुरुदासपुर से निकले ही थे कि आप उठा दीं. दीपाजी मुंह ढक कर हंसने लगीं. रेडियो कोसी पर डॉक्यूमेंट्री बनायेगा. अच्छी बात है. मेरा कहा सच हुआ न, हम कहे थे न कि इस आविष्कार को पेपर में छपवायेंगे.
- मगर आधा कहानी...
- अरे हम बता देंगे, मेरे स्पाइडरमैन... चलो, वहां कैमरा सेट करके पत्रकार इंतजार कर रहा है.
प्रह्लाद ने झठ से कुल्ला किया और उस जगह पहुंच गया जहां अनीस कैमरा सेट कर आसन जमाकर बैठे थे. यह जगह उसके रेडियो स्टेशन वाले घर के ठीक सामने थी, जिसका नाम उसने रेडियो कोठली रख दिया था. यह पंद्रह बाइ पंद्रह का एक फूस का घर वर्गाकार था, जिसमें एक ही कमरा था. घर की दीवारें भी बांस के टाट की ही बनी थी, जिस पर मिट्टी का पलस्तर किया हुआ था. दीवारों पर गोबर और रंग से कई चित्र बने थे, जो पड़ोस के गांव में रहने वाली आदिवासी औरतों ने बना दिये थे. छप्पर की छौनी खर से की गयी थी जो कोसी के पेट में बहुतायत में मिलती थी, मगर उसके ऊपर कई तरह की एंटेनानुमा चीजें इस तरह लगी थीं जैसे चंद्रकांता सीरियल के क्रूर सिंह के बाल हों...
सामने बांस की बत्तियों से बेंचनुमा मचान बना हुआ था, यह लोगों के बैठने की जगह थी. एक दो लकड़ी की कुरसियां भी थीं. अनीस रेडियो कोठली को बैकग्राउंड बनाकर प्रह्लाद से बात करना चाह रहे थे, सो कैमरे को ट्राइपॉड पर लगाकर एक कुरसी पर बैठ गये थे. प्रह्लाद शर्माते-सकुचाते वहां पहुंचा और कहने लगा, अनीस भाई झपकी लग गयी थी....
अनीस ने माइक को प्रह्लाद के कॉलर में लगा दिया और सामने किसी कुरसी पर बैठने कहा. प्रह्लाद मचाननुमा बांस के बेंच पर बैठ गया.
- अनीस भाई, दीपाजी को भी साथ रख सकते हैं...?
- जरूर, ये तुम्हारी पत्नी हैं ना...
- जी...
- सवेरे ये हीं आंगन में झाडू देती हुईं एंकरिंग कर रही थीं. मैंने देखा था... आइये... आप भी साथ बैठिये... मैंने आपका सुबह वाला सीन सूट कर लिया है. अगर आप लोगों की इजाजत होगी तो उसे भी इस्तेमाल करना चाहूंगा.
- कर सकते हैं... इस बार दीपा ने बातचीत की कमान अपने हाथ में ली... यह तो हमारा रोज का काम है... इसमें क्या झिझक...
- अरे... आप तो बहुत अच्छी हिंदी बोल लेती हैं... अनीस को अब तक दीपा के बारे में ठीक से पता नहीं था..
- मुझे तो आपकी टिप्पणी इस बात पर चाहिये कि मेरी मैथिली कैसी है... सुबह आपने सुना था न... अब बताइये मेरी मैथिली कैसी है...
- अच्छी है... वह तो आप बोलेंगी ही न... आपकी मातृभाषा है..
- जी, आप समझे नहीं... मेरी मातृभाषा मैथिली नहीं, पंजाबी है... प्रह्लाद ने बताया नहीं...
अनीस के मुंह से फिर आयं... निकल गया. यह कोसकन्हा का छौरा कितना झटका देता है.
तभी शूटिंग देख रही भीड़ से आवाज आयी... लव मैरीज है अनीस भाय... कोठ मरीज... हलांकि कोठ-कचहरी हमलोग जाने नहीं दिये... गामे में वियाह करवाके फोटो-फाटो खिचवा दिये थे.
अनीस भाय को लगा कि कहीं जनता इनके प्रेम कहानी के कोठी में हाथ न डाल दे... ऐसा हुआ तो दिन भर इसी रसचर्चा में बीत जायेगा. उन्होंने लोगों को रोक कर झट-पट इंटरव्यू शुरू कर दिया... बीच-बीच में कई एक्शन शूट किये... प्रह्लाद और दीपा से एंकरिंग करवाते हुए... प्रह्लाद से छप्पर पर चढ़कर एंटेना ठीक करवाते हुए... और कई और सीन... इंटरव्यू के दौरान प्रह्लाद ने गुरुदासपुर में रेडियो स्टेशन बनने और वहां से भागने की कहानी तो बता दी, मगर जब यह बताने की बारी आयी कि गांव में रेडियो स्टेशन कैसे खोला तो वह लड़खड़ाने लगा.
उसने हंसते हुए बताया, जानते हैं अनीस भाई, जब हमलोग पंजाब से भागकर आये तो दीपाजी के हाथ में एक बड़ा बैग था, मगर पटना पहुंचते-पहुंचते दीपाजी ने फरमाइश कर दी कि एक जोड़ी कपड़ा तो खरीदना ही पड़ेगा. हम बोले कि इतने बड़े बैग में एक भी कपड़ा नहीं है, तो जानते हैं दीपाजी क्या बोलीं.... अरे नहीं इसमें तो मेरा रेडियो, डेक और कैसेट है. यही रेडियो, डेक और कैसेट हमको दहेज मिला तो हम और कर ही क्या सकते थे. गांव में रेडियो स्टेशन ही शुरू कर दिये.
इस पर अनीस ने कहा कि चलो, अब आगे की कहानी दीपा को ही सुनाने दो... उसकी नजर से हम जानने की कोशिश करते हैं कि एक पंजाब की लड़की कैसे कोसी बांध के भीतर के गांव में पहुंची और कैसे तुमलोगों ने यहां रेडियो कोसी शुरू किया... क्यों दीपाजी ठीक है न....

रविवार, मार्च 03, 2013

बरतुहार(रेडियो कोसी-10)

तू करेगा या मुझे ही यह भी करना पड़ेगा... दीपाजी ने प्रह्लाद से पूछा...
क्या...?
वही जो अपने बीच इतने दिनों से चल रहा है, उसका नाम क्या है, और उसका अंजाम क्या है?, यह तो तय करना पड़ेगा न मिस्टर...
…. मुझे मालूम था, यह भी मुझे ही करना होगा... कुछ तो सोचा कर... लड़कियां कभी ये सब करती हैं... सुना नहीं, राम तेरी गंगा मैली का गाना.... कोई हसीना कदम, पहले बढ़ाती नहीं... दीपाजी ने मुस्कुराते हुए कहा.
दूसरी ओर प्रह्लाद भयंकर कंपकंपी का शिकार हुआ बैठा था. वह बाहर से खुद को सहज रखने की कोशिश कर रहा था, मगर अंदर बुखार की शुरुआत जैसी हालत थी. इतने झटके एक साथ सहने की हालत में नहीं था. एक तो अभी-अभी सोफे पर बैठने वाला गधा जनम छूटा था, उसका झटका अलग था, वह यह तय कर भी नहीं पाया था कि सोफे के पीछे शरीर टिकाना उचित माना जायेगा या नहीं, कहीं कोई हास्यास्पद स्थिति तो पैदा नहीं हो जायेगी. तभी हसीना की ओर से कदम बढ़ाने की चुनौती पेश कर दी गयी.
इस बार तो बिना जवाब के काम चलने वाला नहीं था, कहीं नाराज होकर दीपाजी कमरे से भगा न दें. प्रह्लाद के गले से मरी-मरी आवाज निकली- हम तै..या..र हैं... हैं तक पहुंचते-पहुंचते आवाज सीटी में बदल गयी.
दीपाजी का मन जोर से ठहाका लगाने का हुआ, मगर उन्होंने बड़ी मुश्किल से उसे हल्की मुस्कुराहट में बदला.
चलो, अच्छा लगा जानकर कि तुम तैयार हो... इतना काफी है...
कुछ देर चुप रहने के बाद दीपाजी ने कहा, देखो प्रह्लाद... तुम्हारी बात मैं नहीं जानती मगर मेरे लिए यह कोई साधारण बात नहीं है. हमलोगों के बीच एक रिश्ता बनने लगा है, इसे नाम देना है. आज एक मौका है... आज तुम चाहो तो इससे अलग हो सकते हो... कह सकते हो कि तुम्हे अब इससे आगे नहीं जाना... तुम ऐसा कह दो और हमलोग कल से मिलना-जुलना, बात करना बंद कर देंगे. मगर आज के बाद अगर यह रिश्ता आगे बढ़ता है तो इसका वही अंजाम होगा जो तुम भी समझ रहे होगे. फिर तुम न नहीं कहना... वैसे तुम कह भी डालोगे तो तुम्हारा मैं कर भी क्या सकती हूं... अपना ही करूंगी... तुम मुझे सिर्फ इतना बता दो इस रिश्ते को आगे बढ़ाना है या नहीं....
प्रह्लाद ने देखा, अचानक मुस्कुराते-मुस्कुराते दीपाजी गंभीर हो गयी थीं. वह डरा भी था, घबराया भी और परेशान भी... मगर कोसी का सुकलुचियापन कहां मरने वाला था... न चाहते हुए भी उसने कह ही दिया.
आप तो बरतुहारी कर रही हैं ...
बरतुहारी क्या होता है?
हमारे तरफ जब कोई शादी के रिश्ता की बात करने जाते हैं तो उसको बरतुहारी कहते हैं दीपाजी... और आज पहली बार हम किसी कुमारी कन्या को बरतुहारी करते हुए देख रहे हैं... प्रह्लाद की बात खत्म नहीं हुई थी कि दीपा का ठहाका गूंजने लगा...
उनने झट से अपनी जगह से उठकर प्रह्लाद को चूम लिया.
... मेरी पसंद गलत नहीं है प्रह्लाद... तुम्हारे साथ जीवन खुशियों की बारात होगी, बस तुम अपना इरादा मत बदलना.
मेरी तो कोई बात नहीं है दीपाजी. आप सोच लीजिये और आपको हम विचारने का मौका पूरी जिंदगी देंगे. क्योंकि जो पूरी दुनिया को लगता है वही हमको भी लगता है कि हमारा आपका कोई जोड़ नहीं है. आप का साथ मेरे लिए एक सपना था, जो सपना भगवान ने पूरा कर दिया. साथ-साथ जीवन गुजारना इतना आसान नहीं होता, हमारा गांव आप नहीं देखी हैं... जब गांव की बेटी भी उस गांव में नहीं रहना चाहती तो आप कैसे रहेंगी. इसलिए हम अपनी तरफ से इतना ही कहेंगे कि आज आपको यह रिश्ता ठीक लग रहा है तो ठीक है... इसको तय कर लीजिये... मगर बाद में आपको लगेगा कि प्रह्लाद के साथ जीना मुश्किल है, तो आपको प्रह्लाद के बारे में एक बार भी सोचने की जरूरत नहीं... यह मेरा कंडीशन है. आप जब चाहें इस प्रह्लाद से बाय-बाय कहके रिश्ते की डोर को लूज कर सकती हैं और हमसे दूर जा सकती हैं. डोर को तोड़ने की बात हम नहीं कह रहे हैं दीपाजी क्योंकि रिश्ते में एक मिठास होती है, तोड़ने पर वह मिठास कड़वाहट में बदल जाती है. इसलिए तोड़ियेगा मत, लूज कर लीजियेगा... मिठास भी बची रह जायेगी और बंधन से आजादी भी मिल जायेगी.
तुझे जितना चखती हूं, तुम उतने ही मीठे नजर आते हो कोसी के छोरे... इतना टेस्टी हसबैंड कोई लड़की नहीं छोड़ सकती डियर. अब यह सब बंद करो, समय कम है और काम बहुत सारा. मेरी माताजी कभी भी टपक सकती हैं.
इसके बाद दीपाजी उठकर बगल वाले कमरे की ओर भागीं. लौटीं तो हाथ में मिठाई का प्लेट था. अपने हाथों से एक बरफी हमको खिलाया और हमसे भी ऐसा ही करने के लिए कहने लगी. शरमाते-लजाते हुए हम भी उनको बरफी खिला ही दिये.
फिर वे तत्काल प्वाइंट पर आ गयीं, कहने लगीं कि अब हमको उनके भाई का दुकान हर हालत में छोड़ना पड़ेगा. उनकी माताजी प्लान बनाकर बैठी हैं, उनके भाई के गांव से लौटकर आते ही शिकायत करेंगी और फिर मेरा वह हाल करवायेंगी कि ....
खैर, तय हुआ कि हम आज शाम या कल सुबह माताजी को चाभी सौंप कर दुकान छोड़कर चले जायें. और शहर के आसपास ही कोई और काम पकड़ लें. इसबीच में जब मौका मिलेगा दीपाजी घर से निकलेंगी और फिर दोनों फुर्र...
दीपाजी ने बहुत कुछ सोच के रखा था, बोलीं, जितना जल्दी हो एक मशीन बनाकर अपने पास रख लें और उन्हें भी दे दें. ताकि रेडियो पर ही 82.7 मीटर पर दोनों बात कर सकें. अगले दिन हम उनका घर छोड़ चुके थे, शहर के पास ही एक आफिस में दरबान का काम मिल गया. रात में काम से जब फुरसत मिली तो अपना रेडियो वाला सामान निकाले और उसपर फुसफुसाये, दूसरी तरफ तो दीपाजी जैसे रेडी ही थीं...
हाय रे मीटर 82.7.... मोबाइल का जमाना नहीं था रे भाई.... तब भी हमलोग रोज शाम 9 बजे से रात 12 बजे तक बतियाते थे. फुसुर-फुसुर... आज कल लड़का-लड़की को मोबाइल पर बिजी देखते हैं तो ऊ जमाना याद आ जाता है...
दीपाजी ठीक सोचती थीं... दुकान जो हम छोड़के चले गये तो अच्छा हुआ... दीपाजी की माताजी के मन के भरम मिटने लगा. हालांकि उनके भाइसाहब जब लौटके आये तो माताजी ने कहानी सुना ही दी और कहा कि जल्दी से इसकी शादी के लिए लड़का देखो... माताजी ने भी अपने मायके के रिश्तेदारों से पूछताछ शुरू कर दिया था. हालांकि अभी लड़का फाइनल होने का काम दिल्ली दूर था. मगर, एक रात को दीपाजी ने कहा कि कल हमलोगों को निकल जाना है... हमारे मन में जोश आया कि हम दिलवाले दुल्हनिया का शाहरुख खान बन जायें और माताजी को कहें कि दीपाजी को हमसे बेसी कोई और खुश नहीं रख पायेगा... मगर इतनी हिम्मत नहीं हुई... हम जानते थे कि हमारा बात सुनकर माताजी हंसेंगी हीं... खैर... वही हुआ.

शुक्रवार, मार्च 01, 2013

पिंक टॉप और चेक स्कर्ट(रेडियो कोसी-9)

तफसील की नौबत नहीं आई. माताजी ने बिना पूछे सब समझ लिया था. उन्हें लगता था कि उनके पेट से पैदा हुई यह बच्ची अगर पांच फुट दो इंच लंबी हो गयी है तो इसका मतलब यह नहीं है कि यह क्या करती है उनके समझ में नहीं आये. बचपन से ही वह अपने मन से ही तो समझती आयी हैं कि कब इसको भूख लगती है, कब प्यास. उनने पूछा नहीं, नजरों से बात दिया....
मगर जितना कुछ माताजी समझ रही थीं, दीपाजी की समझ वहां तक नहीं गयी थी. दीपाजी ने पहली बार अपनी मां के आंखों में अपने इस अंकुआते रिश्ते का भविष्य देखा. अभी उनने एक कदम आगे नहीं बढ़ाया था, मां की निगाहें कह रही थी जैसे उसने सर्वस्व निछावर कर दिया है. साथ बैठकर एक कप चाय पीने का मतलब यह तो नहीं कि शादी का कार्ड छपवाना शुरू कर दिया जाये. रंजीत जब घर आया था तो मां ने ऐसे रिएक्ट कहां किया था. क्या सिर्फ इसलिए... कि प्रह्लाद गरीब है, बिहारी है.
मां-बेटी के बीच अबोला शुरू हो गया. दीपाजी ने भी तय कर लिया, मां की सोच बदलने के लिए तो कम से कम वह प्रह्लाद से मिलना-जुलना नहीं छोड़ेगी. मां को जो सोचना है सोचे. अब वह काम खत्म करके सीधे प्रह्लाद के पास पहुंच जाती और देर तक बैठी रहती. इधर-उधर की बातें गपियाती.
माता जी की निगाहों में अब प्रह्लाद के प्रति भी नफरत दिखने लगी थी. जब उसका आमना सामना होता तो प्रह्लाद इस बात को साफ-साफ नोटिस करता. कभी बातचीत की नौबत आती तो वह कड़ुआहट जुबान में मौजूद रहती. उसके समझ में आ रहा था कि यह कड़ुआहट क्यों है. मगर वह क्या कर सकता था. दीपाजी को वह बुलाता नहीं था. आती भी तो भरसक रिजर्व रहने की कोशिश करता. हालांकि मन में बसी देवी को दूसरों की भावना के खातिर वह कब तक ठुकरा सकता था. दीपाजी आती तो उसके मन में पुरबा बयार बहने लगती और जब चली जाती तो पछुआ की सायं-सायं का मुकाबला करता.
एक रोज बातें कुछ ज्यादा हो गयी और दोनों को होश नहीं रहा कि शाम का धुंधलका गहरा गया है. माताजी तो जैसे इसी मौके का इंतजार कर रही थीं. दनदनाती हुई मौका ए वारदात पर पहुंच गयीं.
ऐ प्रह्लाद... हरजीत नहीं है तो तैने आजादी मिल गयी क्या... जब देखो गपियाता रह्नदा... काम धंधा कुछ नहीं है दुकान में... बिकवा के रहेगा उसकी दुकान... ऐं... प्रह्लाद तो नौकर है, उसको तो कहा ही जा सकता है...
मगर प्रह्लाद जब तक संभलता और जी..जी... कहके अपनी बेगुनाही साबित करने की कोशिश करता दीपाजी ने मोरचा संभाल लिया.
मेरा गुस्सा इस बेचारे पर क्यों उतार रही है... मैं आती हूं इससे गपियाने की खातिर, ये मेरे पास नहीं आता.... जो कहना है सीधा मुझसे कह... घर आजा महरानी... लाज शरम घोल कर पी गयी है...
बहरहाल दीपाजी के घर जाने के बाद दोनों मां-बेटी में कैसा युद्ध हुआ इसकी जानकारी प्रह्लाद को नहीं है.. मगर वह खुद इस वाकये के बाद सतर्क हो गया... दीपाजी अगर आती भी तो वह हां-हूं ही करता रहता ताकि दीपाजी जल्द लौट जाये और फिर से कोई और सीन क्रियेट न हो...
एक रोज दीपाजी ने उसे टोक ही दिया, अगर यह नौकरी छूट गयी तो लगता नहीं तुझे कोई दूसरी नौकरी मिल पायेगी... तभी इतना डरा-डरा रहता है.
कोसी कछार का सीधा-सादा युवक... जिसने अब तक की पूरी जिंदगी दूसरों के अहसान तले ही गुजारी... उसे पता नहीं था कि कुछ मौके ऐसे भी होते हैं जब रीढ़ सीधा कर खड़ा हो जाना पड़ता है और दूसरों की आंखों में आंखें डालकर अपना हक वसूल लेना पड़ता है. लिहाजा दीपाजी के इस खून-खौला देने वाले कमेंट पर भी वह थोड़ा ही हिला.
उसने कहा- जी दीपाजी... नौकरी तो मिल जायेगी.... मगर मैं हरजीत भाई को क्या मुंह दिखाउंगा.
ठीक है हरजीत भाई को ही मुंह दिखाते रहना... मुझे अब कभी मुंह नहीं दिखाना. तेरे पर तो कोई अंगार डाल दे तब भी तू हिलेगा नहीं. इतना कह कर दीपाजी तमतमाती हुई लौट गयी.
प्रह्लाद पर तो जैसे बज्रपात हो गया. मगर दीपाजी का ही कहना सही साबित हुआ. इस बज्रपात के बाद भी प्रह्लाद ने दुकान से बाहर आकर दीपाजी को मनाने की कोशिश नहीं की. वह किसी शहीद की तरह खिड़की से लगातार बाहर देखता रहता. दीपाजी उसे देखकर नफरत से मुंह फेर लेती और वह इसे अपना प्रतिदान मानकर सहता रहता. ऐसे ही कई दिन गुजर गये. अब हरजीत भाई के आने में एक ही हफ्ता बांकी रह गया था. दीपाजी ने अपनी किस्मत को स्वीकार कर लिया और मान लिया कि अब जो कुछ भी करना है उन्हें ही करना होगा. शाम के वक्त जब वे चाय देने गयीं तो उनने कह दिया... कल दस बजे तैयार रहना मैंनु तुझसे कुछ गल-बात करनी है.
माताजी पौने दस के करीब गुरुद्वारे जाती थीं तो लौट कर साढ़े ग्यारह बजे आती थीं. यह बात प्रह्लाद को मालूम थी. उसका दिल इस अहसास से रात भर धड़कता रहा कि दीपाजी क्या कहने वाली हैं.
सुबह उठते ही दीपाजी ने झट पट किचेन का काम निबटाया और सीधे बाथरूम में घुस गयीं. माताजी ने पूछा, कहीं जाना है कुड़ी...
नहीं...
फिर ... सवेरे-सवेरे...
ऐवें...
नहा-धोकर निकली दीपाजी सीधे ड्रेसिंग टेबुल के पास पहुंच गयीं. माताजी का माथा ठनका, कई बार बिना बाल संवारे कॉलेज चली जाने वाली दीपा को हो क्या गया है... मगर थोड़ी देर बाद बात दिमाग से निकल गयी.
पौने दस बजे माताजी जब गुरुद्वारे के लिए निकली तब दीपाजी ने गोदरेज से अपना वह ड्रेस निकाला जो पिछले साल उनने खरीदा था मगर पहना आज तक नहीं था. यह पिंक कलर का टॉप था और रेड एंड ह्वाइट चेक का स्कर्ट. ड्रेस रखकर बाहर निकलीं. खिड़की से आंगन की ओर झांक रहे प्रह्लाद पर नजर डाली. पास जाकर कहा, इंतजार करना... लड़कियां जब दस कहती हैं तो इसका मतलब दस नहीं होता है...
वापस आकर तैयार होने लगीं.
सवा दस बजे दुकान के दरवाजे पर दस्तक हुई. प्रह्लाद दम साधे इस दस्तक का इंतजार कर रहा था. दरवाजा खोला तो ओस में भींगा एक गुलाब फूल नजर आया. अधखिला. गुलाब के बाल गीले थे. चेहरा दीये की तरह दमक रहा था. ... और कपड़े ताजी पंखुड़ियों सरीखे लग रहे थे. इस गुलाब फूल को देखने के लिए तो वह तमाम उम्र इंतजार करने के लिए तैयार था.
दीपाजी के सुबह-सुबह बाथरूम में घुस जाने से प्रह्लाद को कुछ-कुछ भनक लग गयी थी. वह भी नहा धोकर तैयार बैठा था.
दीपाजी ने उसे देखा तो कहा- वाह... तुम भी तैयार हो...
जी... कह कर प्रह्लाद दीपाजी को अंदर आने का रास्ता देने लगा.
आज यहां नहीं....
फिर...
अंदर चलो...
अंदर..?
हां... हमारे ड्राइंग रूम में... आज वहीं बात करेंगे...
प्रह्लाद के मन में कई सवाल कौंधे... मगर वह चुप रहा... चुपचाप दीपाजी के पीछे चल पड़ा.

मंगलवार, फरवरी 26, 2013

अब नार्मल रह पाना कहां मुमकिन था(रेडियो कोसी-8)

रेडियो कोसी और दीपाजी की कथा एक दूसरे से इतनी गुथी हुई है कि इसमें से एक की कहानी को अलग करना बहुत मुश्किल है. जब वह दीपाजी की कथा किसी को सुनाने लगता है तो अपने आप रेडियो कोसी की कथा साथ-साथ चलने लगती है. आज वह रेडियो कोसी की कथा गुन रहा है तो भला दीपाजी की कथा कैसे इससे अलग हो.
...तो उस वक्त जब दीपाजी माइक लेकर प्रह्लाद की शान में कशीदे पढ़ रही थीं, उनके मन में कुछ भी नहीं था. वे सच्चे दिल से एक आविष्कारक की तारीफ कर रही थीं. मगर जैसे ही उनने बोलना बंद किया और रेडियो लाने दुकान की तरफ बढ़ी. उनके मन में यह सवाल कूद पड़ा. प्रह्लाद क्या सोच रहा होगा... मतलब प्रह्लाद ने इन बातों को सामान्य तौर पर लिया होगा या उसके मन में इस बात ने प्रेम का अंकुर तो नहीं उगा दिया होगा... मतलब प्रह्लाद एक जवान लड़का है और वह एक जवान लड़की... आम तौर पर इस उम्र में हर नजदीकी प्रेम की संभावना को जन्म देती है... उसने कही गलत तो नहीं कर दिया... क्या उसे एक झटके में इतना खुलना चाहिए था. प्रह्लाद को इतना लिफ्ट देना ठीक नहीं हुआ... उसे रौ में नहीं बहना था... मतलब, एक झिझक... अब यह झिझक उसके चेहरे पर सवार था. उसी झिझक के साथ वह दुकान में पहुंची. उसकी निगाहें झुकी हुई थीं... चुपचाप रेडियो उठाया और लौट गयी. एक बार भी सिर उठाकर प्रह्लाद की ओर नहीं देखा. भागते हुए अपने कमरे में घुस गयी, रेडियो रखा और अपने बिस्तर पर बैठ गयी. दिमाग वहीं लटका था.
अब दूसरा संकोच... इस बार उसने ज्यादा बेरुखी दिखा दी. उसे नार्मल रहना चाहिये था. एक-आध बात कह देती तो क्या होता. अभी प्रह्लाद सोच रहा होगा, उसे कोई बात बुरी लगा गयी है. जबकि उसे प्रह्लाद की कोई बात बुरी कहां लगी है. उसकी गलती भी कहां है. रेडियो पर बोलने का मन तो उसे ही हुआ था. वह इतनी उत्साहित थी कि मुंह से प्रह्लाद की तारीफ ही निकल गयी. उसे एक बार फिर जाकर सारी बातें नार्मल कर लेनी होगी. नहीं तो प्रह्लाद को बुरा लगेगा. नार्मल ही तो करना है... नार्मल दिखना ही जरूरी है. दीपा सोचती रही...मगर अब नार्मल हो पाना मुमकिन कहां था. वायरस उसके अंदर चुपके-चुपके घुस गया था. बहुत तेजी से वह अपनी संख्या बढ़ाने में जुटा था. दीपा डिजास्टर मैनेजमेंट में जुटी थी. उसने सोचा, प्रह्लाद को चाय ही पिला दी जाये. हालांकि यह चाय का वक्त नहीं था, मगर... कहा जा सकता था कि आज इस खुशी के मौके पर एक कप स्पेशल चाय...
दीपाजी ने झटपट दो कप चाय तैयार किया और दुकान की ओर बढ़ चलीं. दरवाजे तक पहुंचते-पहुंचते उसके कदम फिर डगमगाने लगे. कहीं प्रह्लाद कोई गलत मतलब तो नहीं निकाल लेगा. उनने कदम वापस खींच लिया. मगर जैसे पलटी रसोई के बाहर मां नजर आ गयी. मां को वह क्या कहेगी... चाय लेकर कहां गयी थी और लौट क्यों रही है...
अंदर जाने में ही भलाई है...मगर दुकान के दरवाजे तक पहुंचते-पहुंचते उनका हर्ट बीट डबल हो चुका था. वह बिल्कुल नर्वस हो गयी थी. अंदर घुसना ही होगा... मगर वह कुछ भी बोल पाने की स्थिति में नहीं थी. दोनो प्याला प्रह्लाद के सामने टेबुल पर रखा और तेजी से वापस हो गयी.
प्रह्लाद के सामने चाय के दो कप पड़े थे. वह अवाक था... आखिर हो क्या रहा है.
दीपाजी इस बार जब लौटी तो सीधे बिस्तर पर जा पड़ीं. उनका दिमाग बेकाबू हो चुका था. भलाई इसी में थी कि वे सोचना बंद कर दे. तकिये में चेहरा छुपाकर वह सो गयीं. उनकी आंख से भरपूर आंसू निकल रहे थे. पूरा शरीर थर-थर कांप रहा था. उसी हालत में वह आधे घंटे सोती रही. थोड़ी देर में आंसू बहना बंद हुआ, शरीर शांत हुआ... धड़कने नार्मल हुई. एक नींद का झोंका आया...
गरमा-गरम चाय के दोनों प्याले प्रह्लाद के सामने पड़े थे. वह बेंच पर बैठा था... दीपाजी की तारीफ भरी बातें सुनकर खुशियों की जो लहर उसके मन में उठी थी वह अब बवंडर की तरह सांय-सांय कर रही थी. पहले दीपाजी का चुपचाप आकर रेडियो ले जाना और फिर घबरायी हालत में दो प्याली चाय रख जाना. कुछ तो गड़बड़ जरूर है. कहीं रेडियो में घुसने वाले इस व्यापार की खबर माताजी तक तो नहीं चल गयी... नहीं... अगर ऐसा होता तो दीपाजी चाय लेकर क्यों आती... अभी तो चाय का वक्त भी नहीं है. दो कप चाय...भाई साहब भी नहीं है... फिर दो कप चाय का क्या मतलब.... दीपाजी को कुछ बुरा तो नहीं लग गया. मन हुआ, एक बार खिड़की से झांक कर देखे... मगर उठने की हिम्मत नहीं हुई. हिम्मत तो कप उठाकर चाय पीने की भी नहीं हो रही थी. दोनों कप उसके सामने पड़े थे, वह उन्हे लगातार देखे जा रहा था. आंखे धुंधलाने लगी थी... मगर वह नजर हटा नहीं पा रहा. वह तो बैठने की पोजीशन तक बदल नहीं पा रहा था. जैसे किसी ने स्टैच्यू कह दिया हो. देर तक इसी स्थिति में बैठा रहा.
दीपाजी जब उठीं तो उनका माथा भारी लग रहा था. आइने में चेहरा देखा ... बिल्कुल सफेद हो गया था. याद आया ढेर सारा काम पड़ा है. अपने खुले हुए बालों को समेट कर जूड़ा बनाते हुए बाहर बरामदे पर आयी... अनायास ही निगाहें उस खिड़की की ओर उठ गयीं... खिड़की में बैठा प्रह्लाद एक टक उन्हीं की तरफ देख रहा था. उनने चेहरा झुका लिया... किचेन की ओर बढ़ चली... दरवाजे पर पहुंच कर एक बार फिर उस खिड़की की तरफ देखा. प्रह्लाद उसी हालत में था.. एक टक देख रहा था...
क्या हुआ... फंसी...फंसी आवाज दीपाजी के गले से निकली.
चाय... यह आवाज तो उससे भी महीन थी.
दीपाजी को जोर से हंसी आ गयी... प्रह्लाद अवाक होकर उनका चेहरा देख रहा था.
आती हूं... दीपाजी दुकान की ओर बढ़ चली.. वह बेकार परेशान थी.. प्रह्लाद तो बड़ा सीधा लड़का है. बेधड़क अंदर गयीं.. कहा...
- दोनों के लिए चाय लाई थी.
- किस दोनों के लिए.
- हम दोनों के लिए ... और किसके लिए...
- अचानक तबीयत खराब खो गयी... इसलिए लौटना पड़ा. अभी गरम करके लाती हूं. दोनों कप लेकर दीपाजी लौट गयीं. प्रह्लाद की हिम्मत नहीं हुई कि पूछे कि तबीयत को क्या हुआ... अच्छा हुआ... वरना दीपाजी क्या जवाब देतीं.
दीपाजी बाहर निकली तो इस बार फिर सामने में माताजी थीं... उनकी आंखों में ढेर सारे सवाल थे. मगर दीपाजी ने फिलहाल तमाम सवालों को होल्ड पर रख दिया. चाय पीकर सारे सवालों का जवाब तफसील से देंगी.

रविवार, फरवरी 24, 2013

साझा अनुसंधान(रेडियो कोसी-7)

दीपाजी को जैसे ही यह बात समझ में आई कि उसके रेडियो में प्रह्लाद की आवाज गूंज रही है वह दौड़ती हुई दुकान के अंदर जा घुसी. फिर प्रह्लाद ने उन्हें दिखाया कि कैसे आवाज उस रेडियो तक जा सकती है. दीपाजी ने खुद अपने हाथ में माइक लेकर इस प्रयोग को दुहराया. अब उनकी खुद की आवाज भी उनके अपने रेडियो से आ रही थी.
- गजब... यह तो कमाल है...कैसे किया ?
- बस...कुछ-कुछ खोल-खाल कर रहे थे कि हो गया.
- एक बार फिर बोलूं...
दीपा के चेहरे से पहली बार खुशी छलक रही थी. ऐसा लग रहा था, जैसे वह दस साल की बच्ची हो.
- नहीं. प्रह्लाद ने न चाहते हुए भी दीपा को मना कर दिया और उसके हाथ से माइक ले लिया.
- यह आवाज सिर्फ आपके रेडियो से ही नहीं, बल्कि आसपास के घरों में इस स्टेशन पर बज रहे सभी रेडियो से आ रही होगी...दीपाजी.
- फिर...? मैं एक बार फिर से अपनी आवाज रेडियो में सुनना चाहती हूं.
- हो जायेगा, मगर इसके लिए इसका मीटर बदलना होगा...
- मतलब...
- इसको ऐसे मीटर पर फिक्स करना होगा, जहां कोई दूसरा स्टेशन नहीं बजता हो. पांच मिनट दम धरिये, हो जायेगा.
- हमें भी तो बताओ, कैसे होगा...
- पहले अपना रेडियो जाकर ले आइये...
रेडियो लेकर वापस लौटी दीपाजी ने देखा कि प्रह्लाद के टेबुल पर कुछ टांजिस्टर और कुछ चिप्स पड़े थे जो एक दूसरे से जुड़े थे. प्रह्लाद ने बताया यही है वह मशीन जिससे यह कमाल हुआ है. अब इसका मीटर फिक्स करना है.
- मीटर कितना रखा जाये... ? प्रह्लाद ने पूछा.
- मतलब.. ?
- अपने स्टेशन का मीटर क्या होगा. ?
- मतलब... तुम अपना रेडियो स्टेशन तैयार कर रहे हो...
- रेडियो स्टेशन ही तो है. इस पर जो बोलेंगे... आसपास के इलाके में जितना रेडियो है सब पर सुनाई देगा. जो उस नंबर पर जायेगा वह सुन लेगा...
- कौन से वेबलैंथ पर यह काम करेगा..
- मतलब ?
- मतलब... शार्ट, मीडियम या एफएम...
- आप क्या सुन रही थीं...
- एफएम...
- तो उसी पर काम करेगा...
- तो तुमको पता नहीं था कि तुम किस वेबलैंथ पर काम कर रहे हो.
- अरे हम कोई इंजीनियर हैं...मीटर घुमाते-घुमाते जहां पकड़ा गया वहीं बजा दिये.
- ठीक है-ठीक है ... ऐसा करो एफएम पर 82.7 नंबर खाली है, उसी को अपना स्टेशन बना दो.
प्रह्लाद पूछना चाह रहा था 82.7 क्यों ...मगर पूछ नहीं पाया. बाद में दीपाजी ने बताया इसी साल सातवें(जुलाई) महीने में उनका जन्म हुआ था.
बहरहाल 82.7 पर स्टेशन फिक्स कर दिया गया और यही 82.7 बाद में रेडियो कोसी का भी स्टेशन बना.
जैसे ही स्टेशन फिक्स हुआ....दीपाजी माइक लेकर दौड़ती हुई अपने कमरे में चली गयीं. कुछ ही पल में रेडियो पर दीपाजी की मधुर आवाज गूंज रही थी.
- प्रह्लाद.... आज तुमने बहुत बड़ा काम किया है... तुमको शायद अहसास न हो, मगर तुमने एक आविष्कार कर डाला है. दो ट्रांजिस्टर और चार चिप से रेडियो स्टेशन बना डाला है. भैया गांव से लौट के आते हैं तो उनसे कहकर तुम्हारे इस उपलब्धि को अखबार में छपवाने का इंतजाम करती हूं. प्रह्लाद.. आइ एम प्राउड ऑफ यू.. मतलब मुझे तुम पर गर्व है... मेरे घर के एक मेंबर... मेरे दोस्त ने आज बहुत बड़ा काम किया है.
जब दीपाजी की आवाज में यह बात रेडियो पर गूंज रही थी, प्रह्लाद के पूरे शरीर में झुरझुरी हो रही थी. एक पल में सबकुछ बदल गया था. जिस दीपाजी की एक झलक पाने के लिए वह दिन में सौ बार खिड़की से झांकता था, वह उसकी तारीफ में कशीदे गढ़ रही थी.
सचमुच उस दिन सब कुछ बदल गया. दीपाजी और रेडियो ने जो उस रोज उसकी जिंदगी में पहला कदम रखा वह आज तक बरकरार है. उसे इन दोनों का भरपूर स्नेह लगातार आज तक मिल रहा है. वह सचमुच किस्मतवाला है, वरना कोसी कछार के अभागे लड़के के नसीब में इतनी खुशी थोड़े ही होती है. मगर यह कहानी अभी आधी है. अभी दीपाजी ने एक ही कदम आगे बढ़ाया है. अभी रेडियो कोसी का सिर्फ स्टेशन नंबर ही फाइनल हुआ है.

बुधवार, फरवरी 20, 2013

रेडियो में घुसने की कथा (रेडियो कोसी-6)

प्रह्लाद के लिए रेडियो में घुसना बड़ा जरूरी था. रेडियो में नहीं घुसता तो दीपाजी को अपने दिल की बात कैसे बताता और अगर दीपाजी को दिल की बात नहीं बताता तो भगवान के रचे-रचाये उस लगन का क्या होता जो खास तौर पर उसके और दीपाजी के प्रेम कहानी के लिए तय हुआ था.
प्रेम या परेम... यह उसकी दुनिया का शब्द नहीं था. यह सिनेमा-नौटंकी से उपजा मामला माना जाता था. उसके गांव में ज्यादातर लोगों की शादी होती थी और शादी के बाद जिसको अपनी बीवी पसंद आती थी उससे वह परेम करने लगता था. जिसकी उतनी पसंदीदा नहीं भी होती वह भी कुछ दिन तो दिखावा जरूर करता. जिसको साफे पसंद नहीं आती, उसकी बात अलग है.
पहले बचपन में शादी हो जाती, तो कोई झमेला नहीं था. मगर जब से 25 के पार शादी करने का चलन शुरू हुआ तो टोला की या रिश्तेदारी की कोई लड़की मन में बसने लगी. अधिकांश लड़के मन की बात मन में रख कर बूढ़े हो जाते, मगर कुछ लोग तो सर्वगुण संपन्न भी होते थे. उनके लिए किवाड़ की ओट भी एकांत हो जाता. कुछ लोग बेधड़क होते थे घर वालों के सामने जिद कर बैठते थे, शादी करेंगे तो इसी से. यह सब व्यापार होता था, मगर उसका नाम प्रेम नहीं होता था.
दीपाजी को पहली बार देखते ही प्रह्लाद को लग गया था कि अगर कोई उसके सपनों की रानी हो सकती है तो वो यही है. वह नजारा प्रह्लाद के मन आज भी हूबहू कैद है, जब दीपाजी पहली बार उससे मिलने आयी थीं... हरजीत भाई का मैसेज लेकर.
उनने पीले रंग का सूट पहन रखा था, हाथ में रंग बिरंगी छतरी थी और बाल हवा में लहरा रहे थे. शायद कुछ ही देर पहले शैंपू किया होगा. उस अधबने मकान की दीवारों को पेंट कर रहे प्रह्लाद ने जब दीपाजी को देखा तो लगा कि इस लड़की को और सुंदर बनाने के लिए अब किसी और रंग की जरूरत नहीं है. इसे इस बिना रंगे दीवार के सामने खड़ा भर कर देने से नेरोलेक पैंट का विज्ञापन पूरा हो जायेगा.
दीपाजी ने बाद में बताया कि पहली नजर में वे भी उसे देखकर चकित रह गयी थीं. वह नजारा कुछ ऐसा था ही. प्रह्लाद रस्सियों के सहारे दीवार में लटका बिल्कुल स्पाइडर मैन लग रहा था. उसके शरीर पर जगह-जगह पड़े पेंट के धब्बे स्पाइडर मैन लुक को और रीयल बना रहे थे. दिलचस्प बात यह थी कि दीपाजी को स्पाइडर मैन की फिल्में काफी पसंद आती थीं. खास तौर पर उस सीन में जब वह हीरोइन को बचाने के लिए अचानक हाजिर हो जाता और संकटग्रस्त हालात के बीच से एक हाथ से उसे उठा कर गायब हो जाता. वे स्पाइडर मैन के स्टीकर खरीदा और अपने कमरे में चिपकाया करती थीं.
आज भी वे उसे कभी-कभी स्पाइडर मैन कह कर बुलाती हैं और कहती हैं तुम मेरे लिए मेरे घर, शहर और जीवन में स्पाइडर मैन बनकर ही आये थे. मगर प्रह्लाद समझ नहीं पाता कि उसके जैसा कोसी कछार का गरीब लड़का किसी के लिए स्पाइडर मैन कैसे बन सकता है.
प्रह्लाद की जिस बात ने दीपाजी के मन में उसकी छवि को पुख्ता किया वह उसकी मुस्कुराहट थी. दीपाजी कहती हैं, उसके मुस्कुराहट में सहजता होती है और उस सहजता में अपनेपन का इशारा... जैसे कोई बरसों पुराना बिछड़ा हुआ मीत हो... जैसे बचपन में खोया कोई खिलौना जवानी में मिल जाये... जैसे किसी फेवरिट फिल्म का कोई कैरेक्टर अचानक सामने खड़ा हो जाये...
मगर.... मगर.... मगर....
इस बात का यह मतलब बिल्कुल नहीं था कि पहली नजर में दोनों में प्यार हो गया और दोनों ने मन ही मन इस बात को स्वीकार कर लिया. यह बात तब की थी जब प्रह्लाद स्पाइडर मैन की तरह रस्सियों में लटका था और दीपा के शैंपू किये बाल बेवजह लहरा रहे थे. मगर प्रह्लाद तीन मिनट के अंदर नीचे आ गया और घर पहुंचते ही दीपा ने वह पीला सूट उतार कर नाइटी पहन लिया और बाल बांध कर किचेन में घुस गयी.
वह प्यार नहीं, सिर्फ इशारा था... एक संकेत कि दोनों के बीच एक बेहतर संबंध की बेहतरीन संभावना है. मगर इस इशारे को कितने लोग डिकोड कर पाते हैं. अपने देश में प्यार का एक ही अंजाम माना जाता है ...शादी.... और प्यार का पहला संकेत पाने वाला महज पांच मिनट बाद शादी की संभावनाओं के बारे में सोचने लगता है. लड़कियां सोचती हैं कि क्या किसी विध्न बाधा के बिना उनकी शादी हो सकती है... वहीं लड़के सोचते हैं कि अगर कोई बाधा है तो उसे कैसे पाटा जा सकता है.
हालांकि इस मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ. धरातल पर आते ही दोनों को अहसास हो गया कि वे एक दूसरे के लिए नहीं बने हैं. दोनों की दुनिया अलग-अलग है. एक बिहारी कामगार है तो दूसरी मध्यम वर्ग की पंजाबन. प्रह्लाद के मन में एक टीस सी उभरी... मगर दीपाजी के साथ अगर ऐसा कुछ हुआ भी होगा तो मन के किसी अंधेरे कोने में दिया जलकर बुझने जैसी बात रही होगी. उसका अहसास भी उन्हें शायद ही हुआ हो.
वैसे भी दीपाजी दो साल पहले एक भीषण किस्म के दर्द से गुजर चुकी थीं. उस दर्द ने उनके मन को कड़ा बना दिया था. उनकी नजर में प्रह्लाद की खासियत महज इतनी थी कि वह बुरा लड़का नहीं था. लड़कियों के लिए अच्छे और बुरे पुरुषों की कैटोगरी बनाना एक जरूरी काम होता है. जो बुरे होते हैं, उनसे वे दूरी बनाकर रहती हैं और जो अच्छे होते हैं उनके पास आने पर भी वे सहज महसूस करती हैं. बुरे लड़कों की निगाहें बुरी होती हैं और स्पर्श भी.
वैसे भी यह एक छोटा सा वाकया था. कहानी एक घंटे में भी खत्म हो सकती थी... अगर प्रह्लाद की नौकरी नहीं छूटती और हरजीत भाई उसे अपने घर से सटे दुकान में काम करने का ऑफर नहीं देते. मगर नियति ने दुबारा अपना जाल फेंका. अब स्पाइडर मैन बिल्कुल करीब आ गया था... कई महीनों के लिए. वह पीली सूट वाली लड़की को रोज चार बार देखने लगा और हर बार और अधिक देखने की तड़प के साथ...
पीली सूट वाली लड़की के बुलेटप्रूफ हृदय में अभी प्यार का तीर नहीं चुभा था. अभी वह नियति के फरेब से अनजान थी. अभी भी प्रह्लाद एक ऐसा लड़का था जो बुरा नहीं था. उसके पास आने पर वह असहज नहीं होती... दुपट्टा संभालने की जरूरत नहीं थी... एक नयी बात यह हुई थी कि उसे पता चल गया था बिहारी इतने बुरे नहीं होते जैसा आम तौर पर दूसरे लोग कहते हैं. ये लोग तो औरतों को इज्जत देना जानते हैं.
मगर क्या यह एक बीज था... जो भी हो, अभी दीपाजी ने रेडियो पर लता के मशहूर गीत... ठोकर न लगाना हम खुद हैं... गिरती हुई दीवारों की तरह... सुनते वक्त प्रह्लाद के बारे में नहीं सोचती थी.... जबकि प्रह्लाद जब भी दीपाजी को इस तरह के गाने सुनता पाता... सोचने लगता कि कैसे गाना बदल दें और दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का गाना... मेरे ख्वाबों में जो आये... लगा दें.
वह दुकान की खिड़की से बार-बार आंगन में झांकता... दिन भर में गिनती सौ को पार कर जाती... मगर एक बार भी दीपाजी की नजर उस खिड़की की तरफ नहीं होती. वे चाय के टाइम... नास्ते के टाइम... खाना-खाने के वक्त ही थे जब दीपाजी को उसका ख्याल आता था. इन्हीं हालात में प्रह्लाद ने सोचा था कि अब रेडियो में ही घुसना पड़ेगा... और वह दिन आ ही गया जब प्रह्लाद ने दीपाजी के रेडियो में घुसने का उपाय ढूंढ लिया.
यह भी नियति की ही चाल थी, वरना कहां दीपाजी और कहां रेडियो कोसी. दोनो असंभव बातें संभव हुईं और आज उसके जीवन का हिस्सा हैं.
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रेडियो में घुसने की कहानी कुछ इस तरह शुरू हुई. एक लड़का कोडलेस माइक ठीक कराने आया था. प्रह्लाद ने इससे पहले कभी कोडलेस माइक नहीं देखा था. एक ऐसा माइक जिसमें कोई तार नहीं लगता है और फिर भी उसमें जो कुछ कहिये, उसे दूर पड़ा स्पीकर कैच कर लेता है. यह यंत्र उसके लिए हैरत का पिटारा था. उन दिनों हरजीत भाई गांव गये हुए थे. दुकान उसी के जिम्मे था. उसने अपने मन का आश्चर्य उस लड़के के सामने जाहिर नहीं किया और उससे एक हफ्ते का समय ले लिया.
ग्राहक के जाते ही उसने माइक का पुरजा-पुरजा खोल दिया और उसके साइंस को समझने में भिड़ गया. दो दिन तक दिन-रात वह उस रहस्य से परदा हटाने की कोशिश करता रहा. वह इस काम में ऐसा रमा कि उसने खिड़की से दीपाजी की तरफ झांकना भी छोड़ दिया. एक ही धुन थी. उसके मन में यह उम्मीद जड़ जमा चुकी थी कि यही तकनीक उसे रेडियो के अंदर घुसा सकती है...
....और तीसरे दिन सुबह-सुबह उसकी आवाज दीपाजी के रेडियो में गूंज रही थी. दीपाजी को पहले-पहल लगा कि रेडियो के सिग्नल में कोई खराबी आ गयी है. वे मीटर साफ करने लगीं... तभी प्रह्लाद ने कहा... अरे दीपाजी यह हमरी आवाज है... हम प्रह्लाद बोल रहा हैं. उस रोज दीपाजी की निगाहें पहली बार उस खिड़की की तरफ उठी. वहां बैठे प्रह्लाद के हाथों में कोडलेस माइक था. चमत्कार हो चुका था.

मंगलवार, फरवरी 19, 2013

दीपशिखा कौर उर्फ दीपा(रेडियो कोसी-5)

बाहरी दुनिया की हर चीज से दीपाजी का नाता दो साल पहले ही छूट गया था.
इसकी भी एक कहानी है, जो दीपाजी ने ही एक इमोशनल रात में सुनाया था. इस कहानी को हम आज तक किसी को भी नहीं बताये थे, मगर अनीस भाय को बताना जरूरी था. इसी कहानी में ऊ प्वांइट छुपा था जिससे किलियर हो जाता है कि दीपाजी जैसी पढ़ी-लिखी और हाय स्टेटस वाली लड़की, मेरे जैसे मजदूर बिहारी के साथ भागकर शादी करने के लिए क्यों तैयार हो गयीं...
... तब दीपाजी कॉलेज जाती थीं. बीए फर्स्ट इयर का तीन-चार महीना बीता था. दो महीना के मेहनत के बाद रंजीत का अप्लीकेशन पास हो गया था, अब वह दीपाजी का ब्वायफ्रेंड था. दीपाजी के लिए यह सब बहुत सीरियस मामला था. उनको मालूम था कि अगर उसको शादी करना है तो लड़का अपने से फाइनल करना पड़ेगा. बाप जिसको ढूंढ कर लाएंगे वह उन्हीं के मनमिजाज का होगा और हरजीत भाय इतने सीधे हैं कि अ-सरदार हो गये हैं. इसलिए वह खाली ब्वायफ्रेंड नहीं बना रहीं अपना जीवन साथी तलाश रही थीं. इसलिए उनने दो महीने तक रंजीत को लटकाये रखा. ठोक-बजाकर देखा, परखा तब जाकर कह दिया आज से मैं तुम्हारी.
मगर ठोकने-बजाने से कहीं आदमी की पहचान होती है. घड़ा का छेद और टायर का पंचर भी तो पानी भरने के बाद ही समझ में आता है. बाहर से सुंदर, सुशील, सीधा और समझदार लगने वाले रंजीत ने भी तब जाकर लीक करना शुरू किया जब दीपाजी ने उसमें अपना सारा प्यार ढार(उढ़ेल) दिया.
रंजीत बिन बाप का बेटा था. मां ने उसे पालने-पोसने में बड़ा दुख झेला था. पति के कपड़े के दुकान पर खुद बैठती तब रंजीत मिडिल स्कूल...हाय स्कूल...कॉलेज करता. वह दूसरे लड़कों की तरह ग्रुप बनाकर हुल्लड़बाजी नहीं करता... अपना समय क्लास और पढ़ाई-लिखायी में गुजारता. कॉलेज से फुरसत मिलती तो इमिग्रेशन एजेंसी भागता जहां वहा पार्ट टाइम काम करता था. दीपाजी को उसकी यही खूबियां पसंद आयी थी.
मगर जो दीपाजी को नहीं पता था वह उसका एक सपना था. वह लंदन जाना और वहां ठाठ की जिंदगी बिताने का ख्वाब देखता था. हालांकि आधे पंजाबी एक ही सपना देखते हैं, एब्रॉड में सेटल हो जाने का. मगर उनके एब्रॉड का मतलब कनैड्डा होता है जबकि रंजीत को लंदन ज्यादा पसंद आता था. कहता था वहां लाइफ रॉयल होती है.
यह सपना ऐसे पूरा होने वाला नहीं था. उसके पास न तो पैसा था और न कोई जमीन जिसे वह बेच डालता. इसलिए उसने इमिग्रेशन एजेंसी में ही नौकरी कर ली जो पंजाब के हर शहर में दो-चार जरूर होती हैं. अब उसका बॉस ही उसको लंदन भिजवा सकता था, वह भी अगर वह उसकी सेवा से खुश हो जाये. इसलिए रंजीत खूब मन लगाकर काम करता था.
मगर सिर्फ मन लगाकर काम करने से भर बॉस खुश तो होता है, काबू में नहीं आता. वह पीठ तो थपथपा देता है मगर ख्वाइश पूरी नहीं करता. यह थ्योरी समझते-समझते दो साल बीत गया. मगर इसका फायदा यह हुआ कि रंजीत बाबू को असली ज्ञान प्राप्त हो गया कि अपने बॉस को कैसे कब्जा कर लेना है.
जहां रंजीत को ज्ञान प्राप्त करने में दो साल लगा, दीपाजी को सिर्फ छह महीने में ज्ञान प्राप्त हो गया. मगर दीपाजी कहती हैं यह छह महीने भी बहुत अधिक थे. उसे तो उसी रोज समझ लेना चाहिये था जब वह अपनी मां से मिलाने के बदले बॉस से मिलाने की बात जोर देकर कहने लगा था. मगर दीपाजी कहती हैं उस वक्त वह अंधी हो गयी थी.
हम दीपाजी से पूछे थे, क्या अभी अंधी नहीं हैं...अपना सबकुछ छोड़ कर मेरे साथ इस बियावान में निकल आयी हैं. यह जगह रहने के लिए दुनिया में सबसे बुरी जगह है मैडम. अभी नहीं बाद में पता चलेगा. तब अफसोस भी हो सकता है. आप अगर कहियेगा कि अफसोस नहीं होगा तो झूठ कहियेगा. जब बच्चा होने वाला होगा तो घड़ी-घड़ी आपको डाक्टर के पास जाने का मन होगा. मगर यहां डिलेवरी के टाइम भी पहुंच गये तो बड़ी बात. बच्चा बड़ा होगा तो सोचियेगा इसको अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहिये. बहुत सारी बात है मैडम... समय के साथ जादू खत्म हो जाता है... प्रेम-प्यार जो है न, अंधा बना ही देता है. आज भी आप अंधा ही हैं.
हमारी बात दीपाजी ने चुप-चाप सुन लिया. एक बार आंख उठाकर देखा...थोड़ा तरेर कर. हम समझ गये. प्यार अंधा ही नहीं बौका(गूंगा) भी बना देता है.
धीरे-धीरे दीपाजी को समझ आने लगा कि रंजीत बाबू उससे प्यार-व्यार कुछ नहीं करते हैं. उ तो चाहते हैं कि दीपा उनके बॉस से दोस्ती कर ले. पहले तो रंजीत बाबू ने इशारे-इशारे में सब खेल करने की कोशिश की, मगर दीपाजी ने सपोर्ट नहीं किया तो एक दिन खुलके अपना प्लान समझा दिया कि... ऐसा करेंगे तो वैसा हो जायेगा और वैसा करेंगे तो तैसा हो जाएगा... बॉस मुट्ठी में... फिर छह महीने के अंदर हम दोनों लंदन में.
दीपाजी ने आंख उठाकर एक बार रंजीत बाबू को देख लिया... घड़ा में बहुत बड़का छेद था. कह दिया, दूसरी लड़की ढूंढ लो, मुझसे न तुम्हारा बॉस कब्जे में आयेगा और न इंडिया छोड़कर लंदन में बसा जायेगा. रंजीत बाबू भी समझदार और सभ्य किस्म के आदमी थे, कोई बखेरा नहीं किये... दीपाजी ने उस दिन के बाद कालेज से नाम कटा लिया, बहुत हो गया. इंडिया में रहने के लिए इतना पढ़ाई काफी है.
घर के लोग यही समझते रहे, अरे दीपा तो सनकी है, मूडी है. एक मिनट में फैसला कर लेती है. बोल दी, कॉलेज नहीं जाना है तो नहीं जाना है. बाद में एक दिन कॉलेज की एक सहेली ने माताजी को बताया कि एक लड़का है, बड़ा भला है. उससे दोस्ती थी. लगता है उसी से कोई झगड़ा हुआ होगा. सुनकर माता जी को हंसी आई, इतना बड़ा झगड़ा कि कॉलेज जाना छोड़ दे. उनने बेटी को समझाया, दूसरा कॉलेज ज्वाइन कर ले. मगर दीपाजी ने उन्हें भी यही कहकर चुप करा दिया, अब नहीं पढ़ना.
तब से रेडियो और टेप यही दीपाजी के साथी हैं. पहले सिर्फ दर्द भरे नगमें सुनती थीं, अब मस्ती भरे गीत भी सुनने लगीं. माताजी और हरजीत भाई से भी सिर्फ काम की बात. कहीं आना जाना नहीं, किसी सहेली से भी नाता नहीं. अब बताइये इस हाल में कोई उनसे दिल की बात कहे भी तो कैसे कहे... रेडियो में तो घुसना ही पड़ता न.