शुक्रवार, जुलाई 11, 2008

विजेता अशोक

कलिंग के सैनिकों की आखिरी खेप
कट कर पड़ी थी, युद्ध क्षेत्र में
और उनके बीच
अश्वारोही अशोक
सोच रहा था
कि कितना फर्क है,
युद्ध की फसल और खेतों की उपज में
कितनी बेतरतीब गिरी हैं ये लाशें
इन्हें समेट कर खजाना भर लेना भी तो मुमकिन नहीं
अपने विजयोत्सव के मुहाने पर
शोक में डूब गया अ-शोक।
चाहा आसपास मिल जाए कोई कृष्ण।
जिसकी गीता साबित कर दे
कि सही किया,
जो कुछ भी उसने किया
यही था एक मात्र उचित विकल्प
मगर हर क्षण
उसकी निगाहों के सामने
छा जाती थी उस नवयौवना की सूरत
अपनी लाश पर चढ़े बिना
छूने नहीं दिया जिसने
‘कलिंग का भाल’

दुःख और क्षोभ से भरा
अशोक
बेबस हो उठा
लौट पड़ा अपने शिविर की ओर
मगर तभी,
उसके अश्व ने पहला पग उठाया था उसी वक्त
पीछे से आई व्यंग्य भरी आवाज-
‘भाग रहा है भगोड़ा’
‘कौन है?’ वह पलटा
‘तो क्या समाप्त नहीं हुआ युद्ध?’
‘अब भी बचे रह गये हैं विपक्षी सैनिक?’
‘इतने शवों से भी तय नहीं हुई विजय?’
वह पलटा
देखा- युद्ध क्षेत्र भरा-पड़ा है विपक्षी सैनिकों से
और अपनी पाली में खड़ा है वह अकेला
आश्चर्य और भय से भर उठा उसका हृदय
मगर जुटाकर हिम्मत
आवाज में बुलंदी
पूछा बैठा-
‘कौन हो तुम लोग?’
‘क्या अब भी बच गये हैं कलिंग में सैनिक?’

‘नहीं’
विपक्षी दल के सेनापति ने कहा
‘हम नहीं हैं कलिंग के सैनिक’
‘न ही और किसी साम्राज्य के’
‘बस इतना समझ लो कि तुम्हारे विपक्षी हैं
हमें जीते बिना बन नहीं पाओगे विजेता’
‘विजेता क्या?’
‘मगध पर भी नहीं देंगे तुम्हें शासन का अधिकार’
‘पहले युद्ध करो, हमें जीतो, फिर चैन से बैठना
अपने राजसिंहासन पर’

भयातुर अशोक ने फिर डाली
शत्रुदल पर निगाह
नकाब से ढके थे उनके चेहरे
जुटाकर हिम्मत उसने फिर पूछा-
‘पहले परिचय तो दो’
‘कम से कम चेहरे तो दिखा दो’

इस आग्रह पर
ठठाकर हंस पर विपक्षी सेनापति
कहा-‘हार गये तुम अशोक’
‘युद्ध उसकी पराजय होती है तय
पहचान नहीं पाता जो शत्रु को भी’

उत्तर बहुत तीखा था
मगर तिलमिलाया नहीं अशोक
उठी नहीं उसके सीने से
क्रोध की लहर।
फूट पड़े बस यही शब्द-
‘हारेगा नहीं अशोक’
‘लड़ेगा पहचानेगा शत्रुओं को
और जीतेगा इस युद्ध को’

यह कहते ही बंद कर ली उसने आंखें
उलट ली पुतलियां अपने मन की ओर
कुछ देर खड़ा रहा निश्चल
फिर उतरा घोड़े से,
फेक दी तलवार
कवच-ढाल, तीर-कमान
मुकुट और महत्वाकांक्षाएं
और क्रोध

करबद्ध, मुस्काता चेहर
बढ़ चला अशोक
शत्रुदल की ओर
उधर से आई आवाज-
‘विजेता अशोक’

4 टिप्‍पणियां:

Shirish Khare ने कहा…

ज़ंग के बाद के हालत पर
एक बहुत अच्छा चित्रण हुआ है
मुझे श्याम बेनेगल के भारत एक खोज मे
महाभारत (अंधायुग) के
उस सीन की याद हो आई है
जिसमे युद्ध के बाद की ग्लानी और
डर के साथ दिखाया गया
पछतावा
अपनी करुण कथा मे
बहुत कुछ अनकहा
छोड़ जाता है
.........
पुष्य भैया
आपकी इन कविताओं
के बहाने
हम
आपसे और आपके विचारो से
रु बा रु होना
एक सुखद
एहसास है

पशुपति शर्मा ने कहा…

पुष्य,
अच्छा लगा... कविता तो अच्छी है ही... ये अहसास और भी सुखद है कि तुम्हारे दिमाग में कीड़े अब भी कुलबुला रहे हैं...
कभी फिर साथ रहने का मौका मिला तो कीड़े अपना विस्तार करेंगे... फिर होगी दस्तक... फिर निकलेगा कारवां

महेन ने कहा…

बंधु। यह कविता मुझे खासतौर पर पसंद आई। कहना भूल गया था। अभी आया तो याद आया।

mediajantantra ने कहा…

पुष्य, काफी दिनों से लग रहा था कि तुम कर क्या रहे हो। आज तुम्हारा ब्लाग खोला-देखा पढ़ा और सोचा कि तुम तो सोच रहे हो। मेरे दोस्त मुझे याद है तुमने अपनी पहली कविता मुझे सुनायी थी मुझे ऐसा ही याद है और मेरी जानकारी भी इतनी ही है। सहारा से लौटते हुये पहाड़गंज के उस फ्लैट में। तुमने काफी लंबा समय तय कर लिया उस कविता से इस कविता तक।
‘युद्ध उसकी पराजय होती है तय
पहचान नहीं पाता जो शत्रु को भी’
धीरेन्द्र............