शनिवार, अगस्त 16, 2008

मेरिट

तुम तो कहते थे कि बरसात में बरसेगी शराब
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया।


सचमुच
जब तुम यह सोच रहे होगे कि
डर गये दुश्मन तुम्हारे नारों से
और उनके पास तर्क नहीं बचे
तुम्हारे सवालों के बरक्श।
हमारा दिल टूटा जा रहा था
और हम उन्हें हथेलियों से थामे
अवाक हो चुकी आंखों से
तक रहे थे तुम्हारे तेवर को।

जब सांसों की डोर भी
गिरवी में रखकर पढ़ाया था तुम्हें
एक दबी सी चाहत जरूर थी कि जब
कि जब ताकत भर आएगी तुम्हारे बाजुओं में
तो लौट ही आओगे सहारा देकर उठाने
अपने धराशायी घरों को।
मगर तुम्हारी साफगोई कि तुमने कह ही दिया
कि बस जाओगे वहीं-कहीं
किसी बड़े शहर की गर्म-गुदाज बाहों में।
तब भी हमने आह को निकलने नहीं दिया
सिर्फ तारीफ ही निकली हमारी जुबां से
कि कैसे-कैसे झंंडे फहरा रहे हैं
हमारे वीर देश-विदेश में
वे रचने में जुटे हैं नया भारत
‘चमकदार भारत’।


पर जब तुमने अपने ही भाई को
घुसने नहीं दिया
उस चमकदार भारत में।
कह दिया,‘मेरिट नहीं है तुम्हारे पास’
तो टूटना ही था हमारे दिल को।


और फिर तर्कों के तीर चले
तुमने भी कह दिया
कोई अहसान नहीं
तुम पर हुए हमारे खर्च
ये तो मेरिट के मुआवजे हैं
मेरिट की कीमत हैं
मेरिट का अधिकार हैं
लिहाजा हमें डर ही जाना था इसे मेरिट के तेवर से


माफ करना अगर तुम्हें बुरा लग जाया यह सुनकर
कि ऐन उसी वक्त हमें याद आ गया
कि जिस मेरिट के तेवर से तुम हमें डरा-धमका रहे हो
वह जुटा है साबुन-तेल और मंजन बेचने में।
वह करोड़ों के लक्जरी अस्पताल में बैठा
लाखों में कर रहा है हमारी जान का सौदा
वह टीवी- मोबाइल और कम्प्यूटर के प्रोग्राम बना रहा है
और उसकी नजर है हमारी छोटी सी बचत पर।


और वह मेरिट
एक ऐसा भारत बनाने में जुटी है
जिसमें अमन पसंद अमीरों के लिये
सहूलियत से उपलब्ध हो
शराब, सेक्स और अफीम
और उनके जश्न में
खलल न पड़े
भूखे-नंगों की चीख से।


हमने टीवी पर देखा
पानी के बौछारों के बीच
खड़े थे तुम किसी फिल्मी नायक की तरह
और मसखरे साबित हो गये थे हमलोग।

(संदर्भ- आरक्षण के समर्थन में एम्स के डाक्टरों का प्रदर्शन )

4 टिप्‍पणियां:

मुकुंद ने कहा…

कैसे हो, पुष्य
मैं ठीक हूं. अपने हालचाल बताना.
मुकुंद, चंडीगढ़. ०९९१४४०१२३०

मुकुंद ने कहा…

पुष्य तुम्हें लिखता देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। लग रहा है जैसे कल की है बात है तुम्हारे कमरे में मुर्गे तोड़ना। कितना अच्छा लगता था। क्या दिन थे। मन करे तो घूम जाना। मैंने संस्थान बदल लिया है। संदीप तिवारी आगरा में है।

रमेंद्र ने कहा…

काफी देर से लिखा पुष्यभाई, हालांकि सही है.
रूपेश और रमेंद्र

बी.एल. गौड़ ने कहा…

dear pushyamittar ji bahut achha likhte hain , badhaai